भारत में कपास की घटती उत्पादकता
पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- भारत में कपास की उत्पादकता में ठहराव के कारण इस पर परिचर्चा तीव्र हो गई है कि क्या केवल नई आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) कपास प्रौद्योगिकियाँ ही उत्पादकता बढ़ा सकती हैं, अथवा मृदा स्वास्थ्य एवं वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।
परिचय
- भारत कपास की खेती के क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा देश है, जहाँ विश्व के कुल कपास क्षेत्र का लगभग 37% भाग स्थित है।
- साथ ही, भारत विश्व के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में भी सम्मिलित है।
- बीटी कपास , विशेषकर बोलगार्ड-II के उपयोग से वर्ष 2002 से 2013 के बीच कपास की उत्पादकता में लगभग 88% की वृद्धि हुई।
- तथापि, वर्ष 2014–15 के बाद मृदा क्षरण, जलवायु परिवर्तनशीलता, कीटों में प्रतिरोधक क्षमता तथा अपर्याप्त कृषि प्रबंधन जैसी संरचनात्मक चुनौतियों के कारण कपास की उत्पादकता में ठहराव आ गया है।
मृदा क्षरण : कपास उत्पादकता में ठहराव का प्रमुख कारण
- संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, भारत की लगभग 32% भूमि क्षरित हो चुकी है तथा लगभग 25% भूमि मरुस्थलीकरण की समस्या का सामना कर रही है।
- भारतीय कृषि भूमि में मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) की मात्रा औसतन 0.3–0.6% है, जबकि उत्पादक कृषि भूमि के लिए वैश्विक स्तर पर 1–1.5% को न्यूनतम आवश्यक माना जाता है।
- राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र के कपास उत्पादक क्षेत्रों में मृदा कार्बनिक कार्बन का स्तर 0.25% से भी कम दर्ज किया गया है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
- मृदा कार्बनिक कार्बन की कमी से—
- मृदा की उर्वरता घटती है,
- आर्द्रता धारण करने की क्षमता कम होती है,
- पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित होती है,
- तथा सूखे एवं जलवायु संबंधी तनावों के प्रति फसल की सहनशीलता कम हो जाती है।
कपास की खेती हेतु उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ
- कपास एक अर्द्ध-शुष्क पौधा है, जिसकी खेती मुख्यतः उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में की जाती है।
- खेतों में बेहतर अंकुरण के लिए न्यूनतम 15°C तापमान आवश्यक होता है।
- इसके वानस्पतिक विकास हेतु 21°C से 27°C तापमान सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
- यह 43°C तक के तापमान को सहन कर सकता है, किंतु 21°C से कम तापमान फसल के लिए हानिकारक होता है।
- भारत में कपास की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जाती है, जैसे—
- उत्तरी भारत की सुव्यवस्थित जल-निकास वाली गहरी जलोढ़ मृदा,
- मध्य भारत की काली चिकनी (रेगुर) मृदा,
- तथा दक्षिण भारत की काली एवं मिश्रित काली-लाल मृदा।
- कपास लवणीयता के प्रति आंशिक सहनशील है, किंतु जलभराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होने के कारण अच्छी जल-निकास वाली मृदा को प्राथमिकता देता है।
स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस (IE)
GAGAN : सटीकता के साथ भारत के आकाशीय नेविगेशन को नई दिशा
पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष
संदर्भ
- भारत ने उपग्रह आधारित नौवहन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। GAGAN (GPS एडेड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन) विषुवतीय क्षेत्र के लिए प्रमाणित होने वाला विश्व का प्रथम उपग्रह-आधारित संवर्धन तंत्र (SBAS) बन गया है।
- हाल ही में नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने GAGAN का उपयोग करते हुए किसी वाणिज्यिक विमान पर भारत की पहली उपग्रह-आधारित लैंडिंग प्रणाली का सफल परीक्षण भी किया।
GAGAN के बारे में
- GAGAN (GPS एडेड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन) भारत का स्वदेशी उपग्रह-आधारित संवर्धन तंत्र (SBAS) है।
- इसका संयुक्त विकास भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) तथा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) द्वारा किया गया है।
- वर्ष 2015 से परिचालन में यह प्रणाली GPS संकेतों की सटीकता, उपलब्धता तथा विश्वसनीयता को वास्तविक समय में सुधारात्मक सूचना प्रदान करके बढ़ाती है।

महत्व
- यह विषुवतीय क्षेत्र के लिए प्रमाणित होने वाला विश्व का प्रथम SBAS है, जहाँ आयनमंडलीय व्यवधान उपग्रह नौवहन को प्रभावित करते हैं।
- यह GPS स्पूफिंग एवं जैमिंग जैसी चुनौतियों के विरुद्ध नौवहन प्रणाली की सुरक्षा एवं विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।
- यह आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत भारत की स्वदेशी नौवहन क्षमताओं को सुदृढ़ करता है।
- इसके माध्यम से भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिनके पास परिचालित उपग्रह-आधारित संवर्धन तंत्र (SBAS) उपलब्ध है।
अनुप्रयोग
- विमानन क्षेत्र के अतिरिक्त GAGAN का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में भी किया जाता है—
- समुद्री नौवहन
- बुद्धिमान परिवहन प्रणाली एवं बेड़ा प्रबंधन
- रेलवे संचालन
- आपदा प्रबंधन
- रक्षा, दूरसंचार समकालिकीकरण तथा भू-स्थानिक मानचित्रण
क्या आप जानते हैं?
- GAGAN की एकीकृत संरचना भारत के व्यापक उपग्रह नौवहन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग है।
- GAGAN के साथ-साथ भारत ने नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) का भी विकास किया है, जो भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली है।

स्रोत: PIB
हेलीकॉप्टर संचालन हेतु भारत की प्रथम पॉइंट-इन-स्पेस (PinS) उपकरण आधारित एप्रोच प्रक्रिया
पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत ने आंध्र प्रदेश के उंडावल्ली हेलीपोर्ट पर हेलीकॉप्टर संचालन के लिए देश की प्रथम निजी पॉइंट-इन-स्पेस उपकरण आधारित एप्रोच प्रक्रिया को स्वीकृति प्रदान कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
परिचय
- इस प्रक्रिया का विकास भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) द्वारा किया गया है तथा इसे नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा अनुमोदित किया गया है।
- इसे DGCA के विनियमों तथा अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के मानकों के अनुरूप विकसित किया गया है।
- PinS प्रक्रिया उन्नत उपग्रह-आधारित नौवहन तकनीक का उपयोग करती है, जिससे ऐसे हेलीपोर्टों पर भी हेलीकॉप्टर सुरक्षित एवं सटीक उपकरण आधारित एप्रोच कर सकते हैं, जहाँ पारंपरिक उपकरण अवतरण अवसंरचना उपलब्ध नहीं होती।
- यह प्रणाली विशेष रूप से प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों तथा उन क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी है जहाँ भूमि-आधारित नौवहन सहायता उपलब्ध नहीं होती।
- अनुप्रयोग: इस स्वीकृति से देशभर में इसी प्रकार की PinS प्रक्रियाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त होने की संभावना है।
- इससे निम्नलिखित क्षेत्रों को विशेष लाभ प्राप्त होगा—
- आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ
- आपदा राहत अभियान
- पर्यटन
- अपतटीय गतिविधियाँ
- तीर्थयात्रा सेवाएँ
- कॉर्पोरेट विमानन
- क्षेत्रीय संपर्क
- यह दूरस्थ एवं सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में उपकरण उड़ान नियमों (IFR) के अंतर्गत अधिक सुरक्षित उड़ान संचालन सुनिश्चित करेगा तथा परिचालन की विश्वसनीयता में वृद्धि करेगा।
स्रोत : AIR
थल सेना के 31वें प्रमुख
पाठ्यक्रम: GS3/ रक्षा
संदर्भ
- जनरल धीरज सेठ ने जनरल उपेंद्र द्विवेदी से भारतीय थल सेना के 31वें प्रमुख (COAS) का कार्यभार ग्रहण किया। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने राष्ट्र की चार दशकों से अधिक की विशिष्ट सेवा के उपरांत सेवानिवृत्ति प्राप्त की।
थल सेना प्रमुख
- थल सेना प्रमुख (COAS) भारतीय थल सेना के व्यावसायिक प्रमुख तथा सर्वोच्च रैंक प्राप्त सेवारत अधिकारी होते हैं।
- वे भारतीय थल सेना के नेतृत्व, प्रशिक्षण, प्रशासन, अनुशासन तथा परिचालन तत्परता के लिए उत्तरदायी होते हैं।
- किंतु संविधान के अनुच्छेद 53(2) के अनुसार भारत के राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं।
- थल सेना प्रमुख की नियुक्ति मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति द्वारा तीन वर्ष अथवा 62 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक के लिए की जाती है।
- COAS, मंत्रिमंडलीय सुरक्षा समिति (CCS) तथा रक्षा मंत्रालय के नेतृत्व वाली नागरिक-नियंत्रित रक्षा व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करते हैं।
नवीनतम घोषणाएँ
- नए थल सेना प्रमुख ने भारतीय सेना को प्रौद्योगिकी-केंद्रित, भविष्य के लिए सक्षम (Future-Ready) तथा पारंपरिक, संकर (Hybrid) एवं उभरते युद्धक्षेत्रों में संचालन योग्य बनाने हेतु “विजय (VIJAY)” रोडमैप का शुभारंभ किया है।
- इस रोडमैप के प्रमुख आधार स्तंभ हैं—
- सतर्कता – परिचालन तत्परता
- नवाचार एवं रूपांतरण – आधुनिक प्रौद्योगिकियों एवं सैन्य सिद्धांतों का विकास
- संयुक्तता एवं एकीकरण – तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय तथा सम्पूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण को प्रोत्साहन
- आत्मनिर्भरता – स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों का विकास
- योद्धा प्रथम – सैनिक कल्याण, प्रशिक्षण, पूर्व सैनिकों एवं वीर नारियों का सशक्तीकरण
- इस दृष्टि का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन देना तथा परिवर्तन के दशक एवं विकसित भारत-2047 के लक्ष्यों के अनुरूप सैन्य तैयारी को सशक्त बनाना है।
स्रोत : AIR
ट्रांसकैस्पियन मारिंका(शिज़ोथोरैक्स पेल्ज़ामी)
पाठ्यक्रम: GS3/ समाचारों में प्रजातियाँ
समाचार में
- अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी कामेंग जिले के एक समुदाय (क्लान) ने रे-फिन्ड मछली ट्रांसकैस्पियन मारिंका के संरक्षण हेतु एक विशेष अभियान प्रारंभ किया है।
ट्रांसकैस्पियन मारिंका
- आवास: यह एक स्वच्छ जल की बेंथोपेलैजिक अर्थात् नदी के तल के समीप रहने वाली मछली है।
- वितरण: यह मुख्यतः तुर्कमेनिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तर-पूर्वी ईरान की नदियों में पाई जाती है।
- यह समशीतोष्ण क्षेत्रों के बेंथोपेलैजिक जलीय पर्यावरण में विकसित होती है।
- IUCN रेड लिस्ट स्थिति: अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने इसे “कम चिंता “ श्रेणी में रखा है, क्योंकि इसका वितरण क्षेत्र व्यापक है तथा इसके प्राकृतिक आवास में वर्तमान में व्यापक स्तर के खतरे नहीं पाए जाते।
- भारत में नवीनतम संरक्षण पहल: अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी कामेंग जिले के सांगनो समुदाय ने सामुदायिक आधारित संरक्षण पहल प्रारंभ की है।
- इसके अंतर्गत स्थानीय रूप से “नगारसिंग” कहलाने वाली ट्रांसकैस्पियन मारिंका की 52 फिंगरलिंग को महाशीर रहित रिचासो धारा में छोड़ा गया है, ताकि इस प्रजाति के संरक्षण एवं संवर्धन को प्रोत्साहन दिया जा सके।
स्रोत : TH
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संक्षिप्त समाचार 02-07-2026